शीर्षक: मिनियापोलिस की सर्द सुबह और एक नागरिक की मौत: एलेक्स प्रेट्टी की कहानी
जनवरी की ठंडी सुबह, सड़कों पर गुस्सा, सवाल और डर—मिनियापोलिस में 24 जनवरी 2026 का दिन कुछ ऐसा ही था। लोग पहले से ही बेचैन थे। संघीय इमिग्रेशन कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे थे, माहौल तनावपूर्ण था और हर किसी को लग रहा था कि कुछ भी हो सकता है। उसी दिन, एक आम अमेरिकी नागरिक, एक नर्स, एक बेटा और एक दोस्त—एलेक्स जेफ्री प्रेट्टी—की मौत हो गई। यह कहानी सिर्फ एक गोलीबारी की नहीं है, बल्कि उस भरोसे की है जो आम लोग व्यवस्था से रखते हैं और जो उस सुबह टूटता दिखा।
एक साधारण इंसान, असाधारण जिम्मेदारी
एलेक्स प्रेट्टी कोई पेशेवर कार्यकर्ता या नेता नहीं थे। वे 37 साल के एक आईसीयू नर्स थे, जो मिनियापोलिस के वेटरन्स अफेयर्स अस्पताल में काम करते थे। उनका रोज़ का काम दूसरों की जान बचाना था। गंभीर हालत में पड़े मरीजों की देखभाल करना, परिवारों को समझाना, और हर शिफ्ट में मौत और जिंदगी के बीच खड़े रहना—यही उनकी दुनिया थी। पड़ोसी और जानने वाले कहते हैं कि वे शांत स्वभाव के थे, हिंसा से दूर रहने वाले इंसान।
पहले से सुलगता माहौल
एलेक्स की मौत किसी खाली माहौल में नहीं हुई। जनवरी के पहले हफ्ते में ही मिनियापोलिस में संघीय एजेंटों द्वारा रेनी गुड की हत्या हो चुकी थी। उस घटना के बाद हजारों लोग सड़कों पर उतर आए थे। नारे लग रहे थे, बहस हो रही थी, और हर दिन सोशल मीडिया पर नए वीडियो सामने आ रहे थे। इसी बीच, एक और व्यक्ति को गोली लगने की खबर आई, हालांकि वह बच गया। कुल मिलाकर, शहर के लोग डरे हुए भी थे और गुस्से में भी।
24 जनवरी की सुबह क्या हुआ
सुबह करीब नौ बजे, शहर के एक व्यस्त चौराहे पर संघीय एजेंट एक कार्रवाई कर रहे थे। बताया गया कि वे एक ऐसे व्यक्ति को पकड़ने आए थे, जिसका इमिग्रेशन स्टेटस अवैध बताया गया। इसी दौरान, आसपास लोग इकट्ठा होने लगे। एलेक्स भी वहीं थे। वीडियो में दिखता है कि वे अपने फोन से पुलिस गतिविधि को रिकॉर्ड कर रहे थे और ट्रैफिक को संभालने की कोशिश कर रहे थे ताकि कोई हादसा न हो।
यह कोई असामान्य बात नहीं थी। आजकल जब भी पुलिस या एजेंट कोई कार्रवाई करते हैं, लोग अपने फोन निकाल लेते हैं। कई बार यह सिर्फ एक नागरिक की निगरानी होती है, ताकि सब कुछ पारदर्शी रहे।
टकराव और अफरा-तफरी
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, एजेंटों ने अचानक आक्रामक रवैया अपनाया। एलेक्स को पेपर स्प्रे किया गया। वे जमीन पर गिर पड़े। कुछ लोग कहते हैं कि वे एक महिला की मदद कर रहे थे, जिसे धक्का दिया गया था। वीडियो में साफ दिखता है कि एलेक्स के हाथ में फोन था, कोई बंदूक नहीं। फिर भी, कई एजेंट उन्हें जमीन पर दबोच लेते हैं।
इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर दिया। कुछ ही सेकंड में कई गोलियां चलीं। रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब पांच सेकंड में दस गोलियां दागी गईं। बाद में एजेंटों की ओर से कहा गया कि एलेक्स के पास हथियार था, लेकिन स्वतंत्र वीडियो विश्लेषण और मीडिया जांच में यह सामने आया कि गोली चलने से ठीक पहले तक वे सिर्फ फोन पकड़े हुए थे।
विरोधाभासी दावे और सवाल
यहीं से कहानी और उलझ जाती है। डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी का कहना था कि एलेक्स ने हथियार के साथ एजेंटों को चुनौती दी। दूसरी ओर, न्यूयॉर्क टाइम्स और कई गवाहों ने कहा कि ऐसा कोई पल नहीं दिखा जब एलेक्स ने बंदूक निकाली हो। सवाल यह भी उठा कि अगर हथियार था, तो वह कब और कैसे सामने आया।
एलेक्स के परिवार ने सरकारी बयानों को झूठा बताया। उनके माता-पिता का कहना था कि उनका बेटा किसी को नुकसान पहुंचाने नहीं गया था। वह सिर्फ मदद कर रहा था, जैसे वह रोज़ अस्पताल में करता था।
मौत के बाद का सन्नाटा और गुस्सा
गोलीबारी के तुरंत बाद, कुछ एजेंटों ने सीपीआर देने की कोशिश की। एम्बुलेंस आई, लेकिन एलेक्स को बचाया नहीं जा सका। उनकी मौत की खबर फैलते ही, लोग फिर सड़कों पर उतर आए। कुछ ही घंटों में सैकड़ों लोग घटनास्थल पर जमा हो गए। नारे लगे, आंसू बहे और सवाल पूछे गए—क्या यह जरूरी था? क्या इतनी ताकत का इस्तेमाल सही था?
प्रदर्शन सिर्फ मिनियापोलिस तक सीमित नहीं रहे। सिएटल, पोर्टलैंड, शिकागो और लॉस एंजेलिस जैसे शहरों में भी लोग सड़कों पर उतरे। हर जगह एक ही सवाल गूंज रहा था—अगर एक अमेरिकी नागरिक, एक नर्स, इस तरह मारा जा सकता है, तो आम आदमी कितना सुरक्षित है?
राजनीति और बयानबाज़ी
घटना के बाद राजनीति तेज हो गई। राज्य के गवर्नर और स्थानीय नेताओं ने संघीय कार्रवाई की आलोचना की। व्हाइट हाउस से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक, बयान आए—कुछ ने एजेंटों का बचाव किया, तो कुछ ने पूरी कार्रवाई को गलत बताया। बिना जांच पूरी हुए, एलेक्स को खतरनाक और आतंकी तक कहा गया, जिसने आग में घी डालने का काम किया।
यूनियनों और नर्स संगठनों ने स्वतंत्र जांच की मांग की। उनका कहना था कि यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों का सवाल है।
जांच और अधूरे जवाब
न्याय विभाग ने जांच शुरू करने की बात कही। स्थानीय प्रशासन ने कहा कि वे चाहते हैं कि सच्चाई सामने आए। लेकिन जब संघीय एजेंसियों ने स्थानीय पुलिस को घटनास्थल से दूर रखा, तो संदेह और बढ़ गया। सवाल यह भी है कि अगर सब कुछ सही था, तो इतनी गोपनीयता क्यों?
एक कहानी जो खत्म नहीं होती
एलेक्स प्रेट्टी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। यह उन बहसों की शुरुआत है, जो आने वाले समय में और तेज होंगी—पुलिस बल का इस्तेमाल, नागरिकों के अधिकार, और सरकार की जवाबदेही। यह कहानी याद दिलाती है कि सत्ता और आम इंसान के बीच की दूरी जब बढ़ जाती है, तो नुकसान सिर्फ एक परिवार का नहीं होता, पूरे समाज का होता है।
मिनियापोलिस की उस सुबह ने यह साफ कर दिया कि सवाल पूछना जरूरी है। क्योंकि जब सवाल मर जाते हैं, तब लोकतंत्र भी धीरे-धीरे दम तोड़ देता है।




