वैष्णवी नरेंद्र शर्मा: गलियों से अंतरराष्ट्रीय मैदान तक एक स्पिनर की उड़ान
जब किसी छोटे शहर की लड़की अपने सपनों को गेंद की तरह घुमाती हुई दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट मंच तक पहुंच जाए, तो उसकी कहानी सिर्फ खेल की नहीं रहती, वह हौसले, मेहनत और भरोसे की मिसाल बन जाती है। वैष्णवी नरेंद्र शर्मा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। ग्वालियर की साधारण सी गलियों से निकलकर भारत की महिला क्रिकेट टीम तक का सफर तय करने वाली वैष्णवी आज नई पीढ़ी की उन खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन पर देश को गर्व है। उनकी गेंदों में सिर्फ स्पिन नहीं, बल्कि संघर्ष, लगन और आत्मविश्वास भी घूमता है।
बचपन और परिवार का सहारा
18 दिसंबर 2005 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्मी वैष्णवी शर्मा एक सामान्य परिवार से आती हैं। उनके पिता नरेंद्र शर्मा सरकारी कर्मचारी हैं और उन्होंने हमेशा अपनी बेटी के सपनों को गंभीरता से लिया। घर में अनुशासन और सादगी का माहौल था, लेकिन साथ ही सपनों के लिए खुला आकाश भी। वैष्णवी के बड़े भाई एक इंजीनियर हैं, जिन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ खेल के महत्व को भी समझा और छोटी बहन को हमेशा प्रोत्साहित किया।
वैष्णवी को बचपन से ही क्रिकेट में दिलचस्पी थी। जब बाकी बच्चे खेल-खेल में क्रिकेट खेलते थे, तब वैष्णवी उसे गंभीरता से ले रही थीं। सिर्फ पांच साल की उम्र में उन्होंने प्रशिक्षण शुरू कर दिया। यह आसान नहीं था, क्योंकि एक लड़की के लिए क्रिकेट को करियर बनाना अब भी कई जगहों पर चुनौती माना जाता है। लेकिन परिवार के भरोसे और खुद के जुनून ने हर रुकावट को पीछे छोड़ दिया।
शुरुआती संघर्ष और सीख
ग्वालियर जैसे शहर में संसाधन सीमित होते हैं, लेकिन सपनों की कोई सीमा नहीं होती। वैष्णवी ने स्थानीय मैदानों पर अभ्यास किया, जहां कभी सही पिच नहीं होती थी, कभी गेंद पुरानी होती थी, तो कभी सुविधाओं की कमी रहती थी। लेकिन इन हालातों ने उन्हें कमजोर नहीं, बल्कि और मजबूत बनाया। यहीं से उनके खेल में धैर्य आया और गेंद को समझने की कला विकसित हुई।
कोचों ने जल्दी ही पहचान लिया कि इस लड़की की बाएं हाथ की स्पिन में कुछ खास बात है। उनकी गेंद में नियंत्रण था, विविधता थी और सबसे बड़ी बात, आत्मविश्वास था। धीरे-धीरे वे उम्र-समूह की प्रतियोगिताओं में खेलने लगीं और हर टूर्नामेंट के साथ उनका नाम चर्चा में आने लगा।
अंडर-19 विश्व कप और चमकता सितारा
वैष्णवी शर्मा के करियर का सबसे बड़ा मोड़ 2025 का अंडर-19 महिला टी20 विश्व कप साबित हुआ। इस टूर्नामेंट में उन्होंने न सिर्फ शानदार प्रदर्शन किया, बल्कि इतिहास भी रच दिया। वे टूर्नामेंट की सबसे ज्यादा विकेट लेने वाली गेंदबाज बनीं और भारत को खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
इस विश्व कप में वैष्णवी ने वह कर दिखाया, जो हर युवा गेंदबाज का सपना होता है। उन्होंने हैट्रिक लेकर पूरे क्रिकेट जगत का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। ऐसा करने वाली वे पहली भारतीय गेंदबाज बनीं। उनकी गेंदों में इतनी सटीकता और आत्मविश्वास था कि बड़े-बड़े बल्लेबाज भी असहज नजर आए। यह प्रदर्शन सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह दिखाता था कि वैष्णवी बड़े मंच के लिए तैयार हैं।
मानसिक मजबूती और विज़ुअलाइज़ेशन की ताकत
वैष्णवी की सफलता के पीछे सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती भी है। उन्होंने खुद कई बार बताया है कि वे मैच से पहले खुद को परिस्थितियों में कल्पना के जरिए देखती हैं। यह विज़ुअलाइज़ेशन उन्हें दबाव में भी शांत रहने में मदद करता है। यही वजह है कि बड़े मैचों में भी वे घबराती नहीं हैं और अपनी योजना पर टिके रहती हैं।
युवा उम्र में इतनी परिपक्व सोच उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती है। वे जानती हैं कि क्रिकेट सिर्फ हाथ और पैर का खेल नहीं, बल्कि दिमाग का भी खेल है। यही समझ उन्हें लगातार आगे बढ़ा रही है।
सीनियर टीम की ओर पहला कदम
अंडर-19 विश्व कप के बाद यह तय था कि वैष्णवी पर चयनकर्ताओं की नजर रहेगी। दिसंबर 2025 में उन्हें श्रीलंका के खिलाफ टी20 अंतरराष्ट्रीय सीरीज के लिए भारतीय महिला टीम में पहली बार बुलाया गया। यह किसी भी खिलाड़ी के लिए गर्व का पल होता है, और वैष्णवी के लिए तो यह सपने के सच होने जैसा था।
अपने पहले ही टी20 अंतरराष्ट्रीय मैच में उन्होंने भारत के लिए डेब्यू किया। डेब्यू कैप उन्हें कप्तान हरमनप्रीत कौर से मिली, जो अपने आप में एक भावनात्मक और प्रेरणादायक क्षण था। उस पल में ग्वालियर की गलियों से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम तक का पूरा सफर सिमट आया था।

खेल की शैली और खासियत
वैष्णवी शर्मा एक बाएं हाथ की ऑर्थोडॉक्स स्पिन गेंदबाज हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत लाइन और लेंथ पर नियंत्रण है। वे बल्लेबाज को बांधकर रखती हैं और उसे गलती करने पर मजबूर करती हैं। उनकी गेंदों में ज्यादा घुमाव के साथ-साथ समझदारी भी होती है, जो अनुभव से आती है।
इसके अलावा वे मैदान पर काफी चुस्त हैं और खेल को पढ़ने की क्षमता रखती हैं। कप्तान के लिए ऐसी गेंदबाज हमेशा भरोसेमंद होती है, जो दबाव के समय भी जिम्मेदारी निभा सके। यही कारण है कि कम उम्र में ही उन्हें बड़े मंच पर मौका मिला।
युवाओं के लिए प्रेरणा
वैष्णवी शर्मा की कहानी आज उन हजारों लड़कियों के लिए प्रेरणा है, जो छोटे शहरों से बड़े सपने देखती हैं। उन्होंने साबित किया है कि अगर परिवार का साथ हो, मेहनत करने का जज़्बा हो और खुद पर भरोसा हो, तो कोई भी मंज़िल दूर नहीं होती।
उनकी सफलता यह भी दिखाती है कि भारतीय महिला क्रिकेट किस तेजी से आगे बढ़ रहा है। अब लड़कियां सिर्फ खेल का हिस्सा नहीं, बल्कि जीत की धुरी बन रही हैं। वैष्णवी जैसी खिलाड़ी इस बदलाव की पहचान हैं।
आगे का रास्ता और उम्मीदें
वैष्णवी शर्मा का करियर अभी शुरुआत में है। अंडर-19 से सीनियर टीम तक का सफर उन्होंने बहुत तेजी से तय किया है, लेकिन असली चुनौती अब लगातार अच्छा प्रदर्शन करने की है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हर मैच एक परीक्षा होता है, और वैष्णवी इस परीक्षा के लिए तैयार दिखती हैं।
आने वाले समय में उनसे न सिर्फ विकेट लेने की उम्मीद होगी, बल्कि टीम को मुश्किल परिस्थितियों से निकालने की भी। अगर वे इसी तरह सीखती रहीं और खुद को निखारती रहीं, तो वह दिन दूर नहीं जब वैष्णवी शर्मा भारतीय महिला क्रिकेट की सबसे बड़ी स्पिनरों में गिनी जाएंगी।
एक नाम, एक भरोसा
आज वैष्णवी शर्मा सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भरोसे का प्रतीक बनती जा रही हैं। उनके खेल में सादगी है, सोच में स्पष्टता है और सपनों में उड़ान है। ग्वालियर की इस बेटी ने यह साबित कर दिया है कि प्रतिभा किसी शहर या साधन की मोहताज नहीं होती। जरूरत होती है तो बस मेहनत, हिम्मत और सही दिशा की।
उनकी कहानी अभी जारी है, और देश को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में यह कहानी और भी सुनहरे अध्याय जोड़ेगी। वैष्णवी शर्मा न सिर्फ विकेट लेंगी, बल्कि लाखों दिल भी जीतेंगी।




