Imaan Mazari: इमान ज़ैनब मज़ारी की कहानी

Imaan Mazari: इमान ज़ैनब मज़ारी की कहानी

इमान ज़ैनब मज़ारी–हाज़िर: आवाज़ जो चुप नहीं कराई जा सकी

कभी-कभी इतिहास ऐसे लोगों को जन्म देता है जो आराम से जी सकते थे, लेकिन उन्होंने सवाल उठाना चुना। ऐसे लोग जिन्हें चुप रहना आसान था, मगर उन्होंने बोलना ज़रूरी समझा। पाकिस्तान की मशहूर मानवाधिकार वकील इमान ज़ैनब मज़ारी–हाज़िर भी उन्हीं लोगों में से एक हैं। उनका नाम आज सिर्फ एक व्यक्ति का नाम नहीं है, बल्कि वह हिम्मत, विरोध और इंसाफ की लड़ाई का प्रतीक बन चुका है।इमान की कहानी किसी किताब में लिखी आदर्श कहानी जैसी नहीं है। यह संघर्ष, डर, धमकी, गिरफ़्तारी और फिर भी न झुकने की कहानी है। एक ऐसी महिला की कहानी, जिसने ताक़तवर संस्थानों से सवाल पूछे और उसकी क़ीमत भी चुकाई।


परिवार और परवरिश: सोच की विरासत

इमान ज़ैनब मज़ारी का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ सवाल पूछना और सच बोलना कोई अपराध नहीं था। उनके पिता ताबिश हाज़िर पेशे से डॉक्टर थे, जबकि उनकी माँ शिरीन मज़ारी पाकिस्तान की जानी-मानी राजनेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता रही हैं। इमान के नाना प्रसिद्ध पाकिस्तानी शायर तौफ़ीक़ रऊफ़ात थे, यानी साहित्य, विचार और बहस का माहौल उन्हें विरासत में मिला।ऐसे परिवार में पली-बढ़ी इमान के लिए सामाजिक मुद्दों को नज़रअंदाज़ करना संभव ही नहीं था। बचपन से ही उन्होंने देखा कि सत्ता और आम लोगों के बीच कितना बड़ा फासला होता है, और शायद वहीं से उनके भीतर इंसाफ के लिए लड़ने का बीज पड़ा।

शिक्षा और क़ानून की दुनिया में क़दम

इमान ने अपनी पढ़ाई यूनिवर्सिटी ऑफ़ एडिनबर्ग से पूरी की। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने क़ानून को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि एक हथियार की तरह देखना शुरू किया—ऐसा हथियार जिससे कमज़ोरों की आवाज़ को ताक़त मिल सके।यहीं से उनका कानूनी सफ़र शुरू हुआ। उन्होंने तय कर लिया कि वह उन लोगों के लिए लड़ेंगी जिनकी बात कोई नहीं सुनता—पत्रकार, छात्र, अल्पसंख्यक समुदाय और वे परिवार जिनके अपने लोग अचानक “ग़ायब” हो जाते हैं।

फ़ैज़ाबाद धरना और पहली बड़ी टकराहट

साल 2017 का फ़ैज़ाबाद धरना इमान के जीवन का पहला बड़ा मोड़ था। जब उन्होंने इस धरने में सेना की भूमिका पर सवाल उठाए, तो विवाद खड़ा हो गया। हालात इतने बिगड़ गए कि उनकी माँ शिरीन मज़ारी को सार्वजनिक तौर पर अपनी बेटी के बयान से दूरी बनानी पड़ी।इसके बाद सोशल मीडिया पर इमान के ख़िलाफ़ एक सुनियोजित मुहिम शुरू हुई। उनकी निजी तस्वीरें वायरल की गईं, उन्हें बदनाम करने की कोशिश की गई। लेकिन इमान पीछे हटने वालों में से नहीं थीं। उन्होंने एक ब्रिगेडियर को मानहानि का कानूनी नोटिस भेजकर साफ़ कर दिया कि डर उन्हें चुप नहीं करा सकता।

पत्रकारों और छात्रों के लिए लड़ाई

जब 2020 में पाकिस्तान में सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज होने लगे, तब इमान चुप नहीं बैठीं। उन्होंने जर्नलिस्ट्स डिफ़ेंस कमेटी के ज़रिए कई पत्रकारों को मुफ़्त कानूनी मदद दी।आसद अली तोर, मुदस्सर नारू और अबसर आलम जैसे पत्रकारों के केस लड़ते हुए इमान ने यह साबित किया कि क़ानून सिर्फ ताक़तवरों के लिए नहीं होता। साथ ही, बलोच छात्रों की नस्ली प्रोफाइलिंग और निगरानी के ख़िलाफ़ उनकी आवाज़ और भी तेज़ होती गई।

धमकियाँ, हमले और डराने की कोशिशें

2021 में हालात और ख़तरनाक हो गए। उनकी माँ को धमकी मिली कि अगर उन्होंने अपनी बेटी को काबू में नहीं किया तो अंजाम बुरा होगा। इसके कुछ ही समय बाद, इस्लामाबाद की अदालत के बाहर इमान की खड़ी कार को किसी अज्ञात वाहन ने टक्कर मार दी।यह साफ़ संकेत था—डराया जा रहा था। लेकिन इमान का हौसला टूटा नहीं। उन्होंने इसे अपनी लड़ाई की कीमत समझकर स्वीकार किया।

देशद्रोह, गिरफ़्तारी और अदालत की राहत

मार्च 2022 में बलोच छात्रों के समर्थन में प्रदर्शन करने पर इमान पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया गया। यह एक गंभीर आरोप था, लेकिन इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने उन्हें गिरफ़्तारी से राहत दी।मुख्य न्यायाधीश अथर मिनल्लाह का यह कहना कि आलोचना पर उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, इमान के लिए ही नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए भी एक बड़ी बात थी। कुछ ही दिनों बाद यह मुकदमा वापस ले लिया गया।

सेना पर बयान और ऐतिहासिक मामला

मई 2022 में उनकी माँ की गिरफ़्तारी के बाद सोशल मीडिया पर इमान का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने तत्कालीन सेना प्रमुख पर टिप्पणी की थी। इस पर उनके ख़िलाफ़ सेना की ओर से एफआईआर दर्ज हुई।यह मामला पाकिस्तान की न्यायिक इतिहास में अनोखा माना गया, क्योंकि अदालत में अभियोजन और बचाव—दोनों ने माना कि बयान दिया गया था, फिर भी अदालत ने इमान को बरी कर दिया। यह फ़ैसला अभिव्यक्ति की आज़ादी पर एक अहम मिसाल बन गया।

पीटीएम रैली, आतंकवाद के आरोप और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

अगस्त 2023 में पश्तून तहफ़्फ़ुज़ मूवमेंट (PTM) की रैली में भाषण देने के बाद इमान को गिरफ़्तार कर लिया गया। उन्होंने कथित गुमशुदगियों पर सेना की आलोचना की थी।जमानत पर रिहाई के बाद दोबारा गिरफ़्तारी और आतंकवाद के आरोप लगाए गए। इस पर ह्यूमन राइट्स वॉच जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने पाकिस्तान सरकार की आलोचना की और कहा कि आतंकवाद क़ानूनों का इस्तेमाल असहमति दबाने के लिए हो रहा है।

मानवाधिकारों की मज़बूत आवाज़

एशियन ह्यूमन राइट्स कमीशन के मुताबिक, इमान मज़ारी उन गिने-चुने वकीलों में से हैं जो इस्लामाबाद में लापता लोगों के मामलों को लगातार उठाती रही हैं। धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों के लिए उनकी लड़ाई ने उन्हें एक अलग पहचान दी है।उनके लिए क़ानून सिर्फ अदालतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सड़क, सोशल मीडिया और आम लोगों की ज़िंदगी से जुड़ा हुआ है।

निजी जीवन और हालिया सज़ा

दिसंबर 2023 में इमान ने मानवाधिकार वकील हादी अली चट्ठा से शादी की। लेकिन यह खुशियाँ ज़्यादा दिन नहीं टिकीं। जनवरी 2026 में दोनों को सोशल मीडिया के ज़रिए राज्य और सुरक्षा संस्थानों को बदनाम करने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया।अगले ही दिन दोनों को 17 साल की सज़ा सुनाई गई। यह फ़ैसला न सिर्फ पाकिस्तान, बल्कि पूरी दुनिया में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के लिए चिंता का विषय बन गया।

निष्कर्ष: नाम जो याद रखा जाएगा

इमान ज़ैनब मज़ारी–हाज़िर की कहानी हमें यह सिखाती है कि सच बोलने की क़ीमत बहुत भारी हो सकती है, लेकिन चुप रहने की क़ीमत उससे भी ज़्यादा होती है। आज वह जेल में हों या बाहर, उनकी आवाज़ दबाई नहीं जा सकी है।

वह सिर्फ एक वकील नहीं हैं—वह एक सवाल हैं, एक चुनौती हैं, और उन हज़ारों लोगों की उम्मीद हैं जो अब भी इंसाफ़ का इंतज़ार कर रहे हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top