भूमिका: जब एक साधारण परिवार से निकलता है एक तेज गेंदबाज
भारतीय क्रिकेट में जब भी किसी नए तेज गेंदबाज का नाम उभरता है, तो उसके पीछे छुपी कहानी जानने की उत्सुकता अपने आप बढ़ जाती है। ऐसी ही एक कहानी है हर्षित राणा की। आज उन्हें लोग एक उभरते हुए भारतीय तेज गेंदबाज के रूप में जानते हैं, लेकिन उनकी यह पहचान रातों-रात नहीं बनी। इसके पीछे बचपन की मेहनत, पिता का सख्त अनुशासन, सही समय पर मिला मार्गदर्शन और खुद पर अटूट विश्वास शामिल है। हर्षित राणा का बैकग्राउंड सिर्फ क्रिकेट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खेल, अनुशासन और संघर्ष की एक प्रेरणादायक मिसाल है।
बचपन और परिवार का प्रभाव
हर्षित राणा का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ जहां खेल को हमेशा सम्मान मिला। उनके पिता प्रदीप राणा खुद एक खिलाड़ी रह चुके हैं। वह CRPF के लिए हैमर थ्रोअर और वेटलिफ्टर रहे हैं। यानी हर्षित के घर का माहौल शुरू से ही फिटनेस, मेहनत और अनुशासन से भरा हुआ था। पिता का खेलों से जुड़ा होना हर्षित के लिए किसी वरदान से कम नहीं था।
घर में रोज़ एक्सरसाइज, फिटनेस की बातें और अनुशासन का पालन होता था। प्रदीप राणा चाहते थे कि उनका बेटा मजबूत बने, चाहे वह किसी भी खेल को चुने। यही वजह रही कि हर्षित का शरीर बचपन से ही खेल के अनुकूल ढलने लगा। पिता की सख्ती कभी-कभी उन्हें मुश्किल जरूर लगती थी, लेकिन आगे चलकर वही सख्ती उनकी ताकत बन गई।
10 साल की उम्र में क्रिकेट की शुरुआत
हर्षित राणा ने सिर्फ 10 साल की उम्र में क्रिकेट की ट्रेनिंग शुरू कर दी थी। खास बात यह रही कि उनकी शुरुआती ट्रेनिंग उनके पिता ने ही करवाई। एक पूर्व एथलीट होने के कारण प्रदीप राणा को फिटनेस, स्ट्रेंथ और तकनीक की अच्छी समझ थी। उन्होंने हर्षित को शुरू से ही सही रनिंग, सही बॉडी बैलेंस और मानसिक मजबूती पर ध्यान देना सिखाया।
पिता का तरीका आसान नहीं था। सुबह जल्दी उठना, फिजिकल ट्रेनिंग, फिर स्कूल और उसके बाद क्रिकेट प्रैक्टिस – यह सब एक बच्चे के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होता है। लेकिन हर्षित ने इसे बोझ नहीं, बल्कि अपने सपने की सीढ़ी माना। यही शुरुआती साल उनके क्रिकेट करियर की नींव बन गए।
स्कूल जीवन और पहली पहचान
हर्षित राणा की पढ़ाई गंगा इंटरनेशनल स्कूल में हुई। यह वही जगह है जहां उनकी क्रिकेट प्रतिभा पहली बार गंभीर रूप से पहचानी गई। स्कूल के दिनों में ही वह बाकी बच्चों से अलग नजर आने लगे थे। तेज गेंदबाजी में उनकी गति और आत्मविश्वास ने कोचों का ध्यान खींचा।
इसी दौरान उनकी मुलाकात कोच श्रवण कुमार से हुई। श्रवण कुमार ने हर्षित की काबिलियत को पहचाना और उन्हें औपचारिक क्रिकेट ट्रेनिंग देना शुरू किया। यह उनके करियर का एक बहुत अहम मोड़ था। पिता की बुनियादी ट्रेनिंग के बाद अब उन्हें प्रोफेशनल कोचिंग मिल रही थी, जिससे उनके खेल में निखार आने लगा।
कोच श्रवण कुमार की भूमिका
कोच श्रवण कुमार ने हर्षित राणा के खेल को एक नई दिशा दी। उन्होंने सिर्फ गेंदबाजी की तकनीक पर ही ध्यान नहीं दिया, बल्कि मैच की समझ, धैर्य और दबाव में प्रदर्शन करना भी सिखाया। हर्षित की लंबाई और तेज़ एक्शन को देखकर कोच ने उन्हें तेज गेंदबाजी पर फोकस करने की सलाह दी।
यहां से हर्षित का क्रिकेट सिर्फ शौक नहीं, बल्कि एक लक्ष्य बन गया। रोज़ाना घंटों अभ्यास, फिटनेस ड्रिल और मैच सिचुएशन की तैयारी ने उन्हें मानसिक रूप से भी मजबूत बना दिया। धीरे-धीरे वह स्कूल क्रिकेट से आगे बढ़कर बड़े टूर्नामेंट्स में खेलने लगे।
संघर्ष और धैर्य की सीख
हर्षित राणा का बैकग्राउंड यह भी सिखाता है कि हर खिलाड़ी का रास्ता आसान नहीं होता। कई बार चयन नहीं हुआ, कई बार प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। लेकिन यहां पिता की सीख और कोच का मार्गदर्शन काम आया। उन्हें हमेशा यही सिखाया गया कि हार अस्थायी होती है, मेहनत स्थायी।
पिता प्रदीप राणा खुद एक फोर्स से जुड़े खिलाड़ी रहे हैं, इसलिए उन्होंने हर्षित को मानसिक मजबूती दी। उन्हें बताया कि दबाव में कैसे खुद को संभालना है और आलोचना को कैसे सकारात्मक रूप में लेना है। यही वजह है कि हर्षित मुश्किल हालात में भी घबराते नहीं हैं।
फिटनेस और अनुशासन: पारिवारिक विरासत
हर्षित राणा की फिटनेस उनके खेल का सबसे मजबूत पक्ष मानी जाती है। इसका सीधा संबंध उनके पारिवारिक बैकग्राउंड से है। एक पूर्व वेटलिफ्टर पिता होने के कारण फिटनेस को कभी नजरअंदाज नहीं किया गया। हर्षित की ट्रेनिंग में स्ट्रेंथ, स्टैमिना और रिकवरी पर बराबर ध्यान दिया गया।
आज जब वह मैदान पर लंबा स्पेल डालते हैं या लगातार तेज गेंदबाजी करते हैं, तो उसके पीछे बचपन से चली आ रही वही फिटनेस संस्कृति है। उनका बैकग्राउंड उन्हें सिर्फ खिलाड़ी नहीं, बल्कि एक प्रोफेशनल एथलीट बनाता है।
व्यक्तित्व और सोच
हर्षित राणा का बैकग्राउंड उनके व्यक्तित्व में भी झलकता है। वह मैदान पर आक्रामक जरूर दिखते हैं, लेकिन मैदान के बाहर शांत और अनुशासित रहते हैं। पिता और कोच दोनों ने उन्हें जमीन से जुड़े रहना सिखाया है। वह जानते हैं कि सफलता स्थायी नहीं होती, लेकिन मेहनत हमेशा काम आती है।
यही सोच उन्हें बाकी खिलाड़ियों से अलग बनाती है। वह न सिर्फ विकेट लेने पर ध्यान देते हैं, बल्कि टीम के लिए सही समय पर सही योगदान देने पर विश्वास रखते हैं।
निष्कर्ष: मेहनत से बनी पहचान
अगर पूछा जाए कि हर्षित राणा का बैकग्राउंड क्या है, तो इसका जवाब सिर्फ इतना नहीं है कि वह एक क्रिकेटर हैं। उनका बैकग्राउंड एक ऐसे परिवार से जुड़ा है जहां खेल, अनुशासन और मेहनत को जीवन का आधार माना गया। 10 साल की उम्र में पिता से मिली ट्रेनिंग, गंगा इंटरनेशनल स्कूल में पहचानी गई प्रतिभा और कोच श्रवण कुमार की औपचारिक कोचिंग – यह सब मिलकर हर्षित राणा को आज का खिलाड़ी बनाता है।
उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखता है। हर्षित राणा का सफर यह साबित करता है कि सही मार्गदर्शन, मजबूत बैकग्राउंड और खुद पर भरोसा हो, तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता।




