सरला महेश्वरी: दूरदर्शन की वो आवाज़
कभी एक दौर था जब शाम होते ही घरों में टीवी के सामने पूरा परिवार बैठ जाता था। न कोई तेज़-तर्रार बहस, न ब्रेकिंग न्यूज़ की भागदौड़। बस एक सधी हुई, शांत और भरोसे से भरी आवाज़—जो दिनभर की खबरें सरल और स्पष्ट शब्दों में देश तक पहुँचाती थी। उस दौर की ऐसी ही एक पहचान थीं सरला महेश्वरी। अब जब 71 वर्ष की आयु में उनके निधन की खबर आई, तो मानो दूरदर्शन के स्वर्णिम दिनों की एक मधुर स्मृति भी साथ ही विदा हो गई।
दूरदर्शन ने सोशल मीडिया पर उनके निधन की पुष्टि करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। यह श्रद्धांजलि सिर्फ एक औपचारिक संदेश नहीं थी, बल्कि उस युग की पत्रकारिता को नमन था, जिसमें सरला महेश्वरी जैसी हस्तियों ने अपनी गरिमा, सादगी और विश्वसनीयता से एक अलग पहचान बनाई।
दूरदर्शन की विश्वसनीय आवाज़
सरला महेश्वरी सिर्फ एक न्यूज़ एंकर नहीं थीं, बल्कि वह उस पीढ़ी की प्रतिनिधि थीं जब समाचार पढ़ना एक जिम्मेदारी माना जाता था, प्रदर्शन नहीं। उनकी आवाज़ में एक अलग ही अपनापन था। न कोई बनावट, न कोई अनावश्यक भाव—बस साफ उच्चारण, संतुलित गति और गंभीरता।
उनकी सबसे बड़ी पहचान थी उनका सटीक उच्चारण और संयमित प्रस्तुति। उस समय न तो आज की तरह कई न्यूज़ चैनल थे और न ही मोबाइल पर हर पल अपडेट आने की सुविधा। लोगों के लिए समाचार का मुख्य स्रोत दूरदर्शन ही था। ऐसे में सरला महेश्वरी जैसे एंकरों पर करोड़ों लोगों का भरोसा टिका रहता था।
दूरदर्शन ने अपने संदेश में कहा कि उन्होंने अपनी सौम्य आवाज़, स्पष्ट उच्चारण और गरिमामयी प्रस्तुति से भारतीय समाचार जगत में एक विशेष स्थान बनाया। उनकी सादगी और व्यक्तित्व ने दर्शकों के मन में गहरा विश्वास पैदा किया। सच कहें तो वह सिर्फ खबरें नहीं पढ़ती थीं, बल्कि खबरों को विश्वास के साथ लोगों तक पहुँचाती थीं।
कक्षा से कैमरे तक का सफर
बहुत कम लोग जानते हैं कि सरला महेश्वरी का जीवन सिर्फ कैमरे के सामने तक सीमित नहीं था। वह शिक्षा जगत से भी जुड़ी हुई थीं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित हंसराज कॉलेज में अध्यापन किया। यह वही कॉलेज है जहाँ बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान ने भी पढ़ाई की थी।
सरला महेश्वरी ने उस समय में अकादमिक और पत्रकारिता—दोनों क्षेत्रों को साथ लेकर चलना आसान नहीं था। वह कॉलेज में छात्रों को पढ़ाती थीं और साथ ही दूरदर्शन पर समाचार वाचन की अपनी पहचान भी बना रही थीं। यह संतुलन उनकी मेहनत, अनुशासन और समय प्रबंधन का प्रमाण था।
एक तरफ वह छात्रों के बीच एक आदर्श शिक्षिका थीं, तो दूसरी तरफ टीवी स्क्रीन पर एक भरोसेमंद समाचार वाचिका। यह दोहरी भूमिका निभाना हर किसी के बस की बात नहीं होती, लेकिन उन्होंने इसे बड़ी सहजता से निभाया।

सादगी में छिपी गरिमा
सरला महेश्वरी की सबसे खास बात थी उनकी सादगी। न तो चकाचौंध का आकर्षण, न ही लोकप्रियता का दिखावा। वह हमेशा शांत, विनम्र और मर्यादित रहीं। उनके व्यक्तित्व में एक अलग ही गरिमा थी, जो स्क्रीन के उस पार बैठे दर्शकों तक साफ महसूस होती थी।
वरिष्ठ समाचार वाचक शम्मी नारंग, जो उनके सहयोगी भी रहे, ने उन्हें याद करते हुए कहा कि वह शालीनता और विनम्रता की मिसाल थीं। वह सिर्फ रूप से ही नहीं, बल्कि दिल से भी खूबसूरत थीं। भाषा पर उनकी पकड़ अद्भुत थी और उनका ज्ञान गहरा था। दूरदर्शन की स्क्रीन पर उनकी उपस्थिति में एक खास आभा थी।
यह शब्द सिर्फ प्रशंसा नहीं, बल्कि उस सम्मान का प्रतीक हैं जो उन्होंने अपने सहकर्मियों और दर्शकों के दिलों में कमाया।
एक बदलते दौर की साक्षी
सरला महेश्वरी ने उस समय पत्रकारिता की जब भारत में टेलीविजन समाचार का स्वरूप विकसित हो रहा था। 80 और 90 के दशक में टीवी समाचार अभी अपने शुरुआती चरण में था। तकनीकी संसाधन सीमित थे, लेकिन जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी।
उस दौर में समाचार पढ़ना सिर्फ शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि देश के प्रति उत्तरदायित्व था। एंकर की आवाज़ ही खबर की विश्वसनीयता मानी जाती थी। ऐसे समय में सरला महेश्वरी ने अपने काम को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाया।
आज जब न्यूज़ रूम में तेज़ रफ्तार, बहस और शोर का माहौल दिखता है, तब सरला महेश्वरी की शांत और संतुलित शैली और भी याद आती है। उन्होंने साबित किया कि प्रभावशाली बनने के लिए ऊँची आवाज़ की नहीं, बल्कि स्पष्टता और सच्चाई की जरूरत होती है।
छात्रों के लिए प्रेरणा
हंसराज कॉलेज में अध्यापन के दौरान उन्होंने न जाने कितने छात्रों को पढ़ाया और प्रेरित किया। वह सिर्फ पाठ्यक्रम तक सीमित शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि जीवन के मूल्यों को भी समझाती थीं। भाषा की शुद्धता, विचारों की स्पष्टता और आत्मविश्वास—ये गुण उनके व्यक्तित्व में झलकते थे और वही वह अपने छात्रों में भी देखना चाहती थीं।
एक शिक्षक और एंकर—दोनों भूमिकाओं में एक समानता थी: संवाद। चाहे वह कक्षा में छात्रों से बात कर रही हों या टीवी पर देश से, उनका उद्देश्य हमेशा स्पष्ट और सटीक संवाद स्थापित करना होता था।
यादों में बस गई आवाज़
उनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने उन्हें याद किया। बहुत से दर्शकों के लिए वह उनके बचपन और युवावस्था की यादों का हिस्सा थीं। जब भी दूरदर्शन पर उनका चेहरा दिखता था, तो एक भरोसा-सा महसूस होता था कि जो खबर सुनाई जा रही है, वह संतुलित और सत्य होगी।
उनकी आवाज़ में एक अलग ही ठहराव था। वह जल्दबाजी में शब्दों को नहीं दौड़ाती थीं। हर वाक्य स्पष्ट और समझने योग्य होता था। शायद यही कारण है कि लोग उन्हें सिर्फ एक एंकर नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद मार्गदर्शक की तरह देखते थे।
एक विरासत जो हमेशा रहेगी
सरला महेश्वरी का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्ची पहचान मेहनत, सादगी और ईमानदारी से बनती है। उन्होंने कभी लोकप्रियता के पीछे भागने की कोशिश नहीं की, लेकिन लोकप्रियता खुद उनके पीछे चली आई।
उनकी विरासत सिर्फ उनके द्वारा पढ़ी गई खबरों में नहीं, बल्कि उस विश्वास में है जो उन्होंने दर्शकों के मन में जगाया। वह उस पीढ़ी का हिस्सा थीं जिसने पत्रकारिता को एक सेवा माना, पेशा नहीं।
आज जब हम उन्हें याद करते हैं, तो सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक युग को याद करते हैं। दूरदर्शन की स्क्रीन पर बैठी वह शांत और संयमित शख्सियत, जो हर शाम देश को दिनभर की घटनाओं से अवगत कराती थी।
अंतिम विदाई
वरिष्ठ सहयोगी शम्मी नारंग ने उनके लिए प्रार्थना करते हुए कहा कि ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे और परिवार को इस दुख की घड़ी में शक्ति प्रदान करे। यह भावना सिर्फ उनके परिवार की नहीं, बल्कि उन लाखों दर्शकों की भी है जिन्होंने उन्हें वर्षों तक अपने घरों में देखा और सुना।
सरला महेश्वरी भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी गरिमा और उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। उन्होंने दिखाया कि सादगी में भी महानता होती है और संयम में भी प्रभाव।
वह दूरदर्शन की एक ऐसी पहचान थीं, जिनकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी। और जब भी भारतीय टेलीविजन समाचार के इतिहास की बात होगी, सरला महेश्वरी का नाम सम्मान और गर्व के साथ लिया जाएगा।




