अजित पवार: सत्ता, संघर्ष और सियासत का एक अधूरा अध्याय
महाराष्ट्र की राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनका ज़िक्र आते ही सत्ता, विवाद, मेहनत और प्रभाव—सब एक साथ सामने आ जाते हैं। अजित अनंतराव पवार उन्हीं नामों में से एक थे। लोग उन्हें सख़्त मिज़ाज का नेता कहते थे, कुछ उन्हें कुशल प्रशासक मानते थे, तो कुछ आलोचक भी कम नहीं थे। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि अजित पवार महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे प्रभावशाली और लंबे समय तक सक्रिय रहने वाले नेताओं में गिने जाते थे। उनकी राजनीतिक यात्रा आसान नहीं थी, लेकिन वह हर मोड़ पर चर्चा का विषय ज़रूर रही।
शुरुआती जीवन: साधारण माहौल से सियासत तक
अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के देवलाली प्रवरा में हुआ। उनका परिवार राजनीतिक रूप से पहले से चर्चित था, क्योंकि वे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के संस्थापक और चार बार मुख्यमंत्री रह चुके शरद पवार के भतीजे थे। हालांकि, रिश्तों के बावजूद उनका बचपन पूरी तरह से आरामदेह नहीं कहा जा सकता। पिता अनंतराव पवार के निधन के बाद परिवार की ज़िम्मेदारी उनके कंधों पर जल्दी आ गई, जिस वजह से उन्हें कॉलेज की पढ़ाई भी बीच में छोड़नी पड़ी।
कम उम्र में ही उन्होंने समझ लिया था कि ज़िंदगी सिर्फ़ किताबों से नहीं चलती, ज़मीन से जुड़कर काम करना पड़ता है। यही सोच आगे चलकर उनकी राजनीति की पहचान बनी—सीधी, कभी-कभी कठोर, लेकिन ज़मीनी।
राजनीति में पहला क़दम और सहकारी आंदोलन से जुड़ाव
अजित पवार ने राजनीति में अपने करियर की शुरुआत बड़े पद से नहीं, बल्कि सहकारी संस्थाओं से की। साल 1982 में वे एक सहकारी चीनी मिल के बोर्ड के लिए चुने गए। महाराष्ट्र में सहकारी आंदोलन का राजनीतिक महत्व बहुत बड़ा रहा है, और यहीं से अजित पवार ने सत्ता की असली समझ हासिल की।
1991 में वे पुणे जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने और करीब 16 साल तक इस पद पर रहे। इस दौरान उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसानों की समस्याएं और वित्तीय ढांचे को नज़दीक से समझा। यही अनुभव आगे चलकर उन्हें एक ताक़तवर प्रशासक बनाता है।
विधानसभा और लोकसभा की राजनीति में मजबूत पकड़
साल 1991 में अजित पवार ने पहली बार लोकसभा चुनाव जीता और बारामती से सांसद बने। हालांकि, बाद में उन्होंने यह सीट अपने चाचा शरद पवार के लिए छोड़ दी, जो केंद्र में रक्षा मंत्री बने। इसके बाद उनका पूरा ध्यान महाराष्ट्र की राजनीति पर केंद्रित हो गया।
अजित पवार बारामती विधानसभा सीट से सात बार विधायक चुने गए। यह अपने आप में बड़ी बात है। 1991 की उपचुनाव जीत से लेकर 2019 और 2024 तक वे लगातार जनता का भरोसा जीतते रहे। बारामती उनके लिए सिर्फ़ एक सीट नहीं थी, बल्कि उनकी राजनीतिक प्रयोगशाला थी।
मंत्री पद और प्रशासनिक भूमिका
अजित पवार ने कई अहम विभाग संभाले, जिनमें सिंचाई, जल संसाधन, ग्रामीण विकास और ऊर्जा जैसे बड़े मंत्रालय शामिल थे। सिंचाई मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल सबसे ज़्यादा चर्चा में रहा। एक तरफ़ उन्होंने कई परियोजनाओं को गति दी, वहीं दूसरी तरफ़ उन पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोप भी लगे।
हालांकि, आरोपों के बावजूद वे बार-बार सत्ता में लौटे। यह दर्शाता है कि उनकी राजनीतिक पकड़ सिर्फ़ सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं थी, बल्कि ज़मीनी स्तर पर भी मज़बूत थी।

उपमुख्यमंत्री के रूप में रिकॉर्ड कार्यकाल
अजित पवार महाराष्ट्र के सबसे लंबे समय तक उपमुख्यमंत्री रहने वाले नेता रहे। उन्होंने अलग-अलग सरकारों में, अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के साथ यह पद संभाला—चाहे वह कांग्रेस-एनसीपी सरकार हो, भाजपा सरकार हो या महाविकास आघाड़ी।
उनकी यह क्षमता कि वे बदलते राजनीतिक हालात में भी खुद को प्रासंगिक बनाए रखें, उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाती है। दिसंबर 2024 में उन्होंने एक बार फिर उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन यह कार्यकाल ज़्यादा लंबा नहीं चल सका।
पार्टी विद्रोह और शरद पवार से अलग राह
अजित पवार की राजनीति का सबसे नाटकीय मोड़ तब आया जब उन्होंने अपनी ही पार्टी के खिलाफ़ बग़ावत कर दी। 2019 और फिर 2023–24 के राजनीतिक घटनाक्रमों में उन्होंने शरद पवार से अलग राह चुनी। यह फैसला उनके समर्थकों और विरोधियों—दोनों के लिए चौंकाने वाला था।
2024 में चुनाव आयोग द्वारा एनसीपी का नाम और चुनाव चिह्न उनके गुट को मिलना उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी जीतों में से एक मानी गई। इसके बाद वे आधिकारिक रूप से एनसीपी के राष्ट्रीय नेता बनकर उभरे।
विवाद और आलोचनाएं: एक सख़्त छवि
अजित पवार का नाम विवादों से कभी दूर नहीं रहा। सिंचाई घोटाले के आरोप, लवासा परियोजना से जुड़े सवाल और 2013 का वह विवादित बयान—इन सबने उनकी छवि को नुकसान भी पहुंचाया। लेकिन उन्होंने सार्वजनिक रूप से माफी मांगने से भी परहेज़ नहीं किया, जो भारतीय राजनीति में कम देखने को मिलता है।
उनके आलोचक कहते थे कि वे सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, जबकि समर्थक मानते थे कि वे निर्णय लेने में दृढ़ और बेबाक नेता थे।
अचानक निधन: राजनीति में एक खालीपन
28 जनवरी 2026 को अजित पवार का निधन एक विमान हादसे में हो गया। वे बारामती में ज़िला परिषद चुनावों से जुड़ी बैठकों के लिए जा रहे थे। इस हादसे ने महाराष्ट्र की राजनीति को झकझोर कर रख दिया। एक ऐसा नेता, जो हर राजनीतिक तूफान से लड़कर आगे बढ़ता रहा, अचानक सबको छोड़कर चला गया।
उनकी मृत्यु के साथ ही महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा खालीपन पैदा हो गया—चाहे आप उनके समर्थक रहे हों या आलोचक।
विरासत: यादों में रह जाने वाला नेता
अजित पवार की विरासत आसान शब्दों में बयान करना मुश्किल है। वे न तो पूरी तरह आदर्शवादी नेता थे और न ही सिर्फ़ विवादों तक सीमित। वे सत्ता की राजनीति को समझने वाले, ज़मीनी गणित जानने वाले और जोखिम लेने से न डरने वाले नेता थे।
इतिहास उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद रखेगा, जिसने सत्ता को सिर्फ़ संभाला नहीं, बल्कि उसे चुनौती भी दी। अजित पवार का जीवन हमें यह सिखाता है कि राजनीति में सफर सीधा नहीं होता, लेकिन अगर पकड़ मज़बूत हो, तो रास्ता बार-बार मिल ही जाता है।




